Saturday, August 1, 2009

तुम्हे कुछ याद तो होगा ?

तुम्हे कुछ याद तो होगा ?

शायद......

ये सवाल है या जवाब ?

हो सकता है .....

क्या ?

ये मैं नहीं जानता.....

मैं समझा नहीं ?

आप सवाल बहुत करते हैं.......

मैं या आप ?

पता नहीं....

तो क्या पता है ?

ये भी पता नहीं.....

वो पल जो हमारे थे ?

मुझे कुछ याद नहीं .....

छोडो जाने दो !

खुदा हाफिज़

फिर एक पल

चल देते,

अकेले होते अगर

ज़िन्दगी तेरी,

आर पकड़

रह गये, लोग रह गये

मोड़ पर,

जो गये थे बिछड़

गुनेहगार हूँ मैं

ज़माने तेरा

आज़माले मुझे तू

फिर एक पल

Friday, July 3, 2009

आ जाओ न

गर्म हवाओं को बसंत की दस्तक

तिलक कर माथे पुरवाई के

आ जाओ झमाझम शरमाई सी

देखो रस्ता तकते हैं सब

चिराग लेकर हांथों में लेकर

न विचिलित करो मुरझाने को

आ जाओ तन मन भिगाने को

रस्ता तुम्हारा तकते हैं सब

धरती का तन बच्चों का अन

Thursday, June 18, 2009

कुछ सवाल हैं ?

कुछ सवाल हैं ?


ये किस के लिए ?

माथे की बिंदिया
कानों में झुमके
गालोंकी लाली
आंखों का काज़ल


किस लिए ?

आंखों का शरमाना
होंठों की जुम्बिश
पलकों का झुक जाना
दिल का घबराना


कौन देता है ?

चलने की अदा
बातों में शरारत
पलकों की नज़ाकत
आंखों में क़यामत


क्या जानते हो ?

आंखों के सवाल
होंठों के ज़वाब
इशारों की भाषा
महकता शबाब


कैसी होती है ?

अधूरी रात
खामोशी में बात
सन्नाटे में हवा
अनसुलझे सवालात


क्यूँ होती है ?

बेचैन रूह
बेचैन आह
बेचैन जिस्म
बेचैन राह


क्या समझ में आता है ?

धड़कता दिल
महकती साँसें
आंखों का सावन
होंठों की बातें


क्या जानते हो ?

प्यार का अर्थ
प्यार की ज़बान
प्यार की भाषा
प्यार की शान










Saturday, May 16, 2009

मुझे तुम प्यार करते हो

मुझे तुम प्यार करते हो

तो ये हक़ भी रखते हो

मेरे ख्वाबों में तुम आओ

मेरी तन्हाईयाँ मिटा जाओ

बहारें तुम से रोशन हैं

नज़ारे तुम से रोशन हैं

तुम ही से है कायनात मेरी

तुम्ही से हर बात मेरी

तुम ही तुम हो ज़माने में

तुम्ही हो दिल लगाने में

कोई न तुम से है दूजा

तुम्हारी करता मैं पूजा

चले आओ ज़रा छुपकर

ज़माने से ज़रा बचकर

मैं अब भी तुम्हारा हूँ

सितम से अब मैं हारा हूँ

कमी क्या है मुझ में ऐसी

क्यूँ तेरे चेहरे पर है उदासी

बात है बस इतनी छोटी

मुझे तुम प्यार करते हो !

Sunday, May 3, 2009

जीवन

नदी की धार पर जीवन

लगे बेकार सा जीवन

न कोई साथी न संगत

चले बस आर पे जीवन

अर्थ जीवन का है गेहरा

बहे किस पार ये जीवन

समा कर खुद को खुद में

अकेला क्यूँ चले जीवन

"सैफ़" ये कैसी है मुश्किल ?

चले बिना अर्थ के जीवन

Sunday, April 26, 2009

नाम लेते हैं

वो मेरा जब भी नाम लेते हैं

वो मेरा इम्तिहान लेते हैं

मैं ठहरी झील नहीं हूँ हमदम

क्यूँ वो चांदनी बिखेर देते हैं

सुबह को, शाम को, और रात में भी

क्यूँ हाथ में वो जाम लेते हैं

वो मेरा मुकद्दर नहीं तो क्या

"सैफ़" गिरते को थाम लेते हैं